27 January, 2018

आया बसंत | ब्लॉग मेरी जुबानी


आया बसंत, आया बसंत!

बाजे है झनन - झनन
मन का मृदंग
चढ़ गया है सभी पर
प्रेम का रस रँग

बस में अब चित नहीं
बदला है  समां- समां
स्पर्श से ऋतुराज के
दिल हुए जवां - जवां

कोकिल सुनाए
मधुर -  मधुर गीत
सरसों का रंग
देखो पीत- पीत

खेतों में झूम रही 
गेहूँ की बाली
मोरनी भी चाल चले
कैसी मतवाली

ख़ुश हुए अलि - अलि
है खिल गई कली- कली

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सुधा सिंह जी शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ी हुई है। सन‍् 2015 से ब्लॉग लेखन कर रहीं है और अब तक कई मुद्दो पर लेख चुकी है। आप कविताओं के माध्यम से अपनी अभिव्यक्तियों को प्रकट करती है। 


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