20 January, 2018

अब स्वप्न हो गए... | ब्लॉग मेरी जुबानी


अब स्वप्न हो गए.... 
वो मेड़ों के बीच से कलकल बहता जल 
वो पुरवाई, वो शीतल मंद बहता अनिल ,
गालों को चूमती वो मीठी बयार
वो फगुआ के गीतों की भीनी फुहार 
वो खेत, वो खलिहान
अब स्वप्न हो गए.... 

वो चने खोटना, नून मिरची लगाना,
औ चटखारे लेकर मजे से खाना, 
जाड़े में सुबह की कुनकुनी धूप सेकना 
वो 'रेखवा की माई' से घंटन बतियाना 
अब स्वप्न हो गए...... 

वो पकड़ी की फुनगी,  करेमुआ का साग
सुतली के फूलों की सब्जी का स्वाद  
वो चना, चबैना , और झंपियों का दौर 
रहट की आवाजे और ट्यूबवेल का शोर 
अब स्वप्न हो गए..... 

पानी जो भरते थे महरिन - महार 
वो डोली,वो बैना, वो नाई - कहार
वो निमिया की डारी पे झूला लगाना, 
सावन के गीतों को सखियों  संग गाना
अब स्वप्न हो गए.....

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए 'मेरी जुबानी' ब्लॉग पर जाएं >>>



सुधा सिंह जी शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ी हुई है। सन‍् 2015 से ब्लॉग लेखन कर रहीं है और अब तक कई मुद्दो पर लेख चुकी है। आप कविताओं के माध्यम से अपनी अभिव्यक्तियों को प्रकट करती है। 


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