13 March, 2018

क्या आज भी 'कन्यादान' के रस्म की जरुरत हैं | ब्लॉग आपकी सहेली


दोस्तों, जैसा कि मैंने अपनी एक पोस्ट "सकारात्मक पहल- एक विधवा ने किया अपनी बेटी का कन्यादान!!" में कहा था कि मैं कन्यादान के रस्म के बारे में चर्चा करूंगी...तो आज हम यह चर्चा करते हैं कि क्या आज भी 'कन्यादान' के रस्म की जरुरत हैं? इस सवाल का जवाब पाने के लिए हमें पहले यह जानना आवश्यक हैं कि 'दान' किसे कहते हैं? किसी भी चल-अचल संपत्ति के स्वामी द्वारा उस वस्तु के लिए कोई मूल्य लिए बगैर यदि वह वस्तु किसी अन्य को हस्तांतरित की जाती हैं, तो उसे 'दान' कहते हैं। यहां यह ध्यान देने योग्य हैं कि दान में दी जाने वाली वस्तु का पूर्ण स्वामित्व दान देने वाले के पास होना आवश्यक हैं। मतलब दान की जाने वाली वस्तु दानदाता की निजी संपत्ति हो यह अति आवश्यक हैं। दान में मिली वस्तुओं की कद्र नहीं होती शायद इसलिए ससुराल वाले बहुओ की कद्र नहीं करते क्योंकि दान में मिली है सो चाहे जैसा इस्तेमाल करे...वाली सोच व्याप्त हो जाती है। हर नारी की हार्दिक इच्छा रहती है कि उसे एक इंसान समझा जाए, वस्तु समझ कर उसका दान न किया जाय। लेकिन परिवार और समाज के आगे उसकी नहीं चलती। युधिष्ठिर, जिन्हें हम धर्मराज कहते है उन्होंने भी द्रोपदी को एक वस्तु समझ कर पांचों भाइयों में बांट लिया था! उनके इस कृत्य का वास्तव में व्यापक पैमाने पर विरोध होना चाहिए था। लेकिन नारी को वस्तु मानने की मानसिकता के कारण ही सब चुप रहे!! कई लोग कहते हैं कि माता सीता का भी कन्यादान हुआ था। यह रीत तो आदिकाल से चली आ रही हैं...फ़िर आज की नारी किस खेत की मूली हैं? मुझे एक बात बताइए, माता सीता की तो अग्निपरीक्षा ली गई थी...उन के चरित्र पर शक करके उन्हें गर्भावस्था में वन में भी छोड़ा  गया था...क्या आप इन बातों को सही मानते हैं? नहीं न! तो फ़िर सिर्फ़ कन्यादान की रस्म को माता सीता का हुआ था इस आधार पर सही कैसे मान सकते हैं?

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ज्योति देहलीवाल जी एक गृहणी है और महाराष्ट्र में निवारसरत है। आप 2014 से ब्लॉग लिख रही है। उनके ब्लॉग पर विभिन्न विषयों से संबधित रोचक जानकारियां और सामाजिक व घरेलू टिप्स आदि ढ़ेरो जानकारीवर्द्धक लेखो की काफी लम्बी श्रृखला है। ज्योति जी से ई-मेल jyotidehliwal708@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है और उन्हे Facebook पर फालो कर सकते है।


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