24 March, 2018

मच्छर बहुत हैं | ब्लॉग एकलव्य


मच्छर बहुत हैं !
मच्छर बहुत हैं,आजकल 
गलियों में मेरे। 
बात कुछ और है 
उनकी गली की !

लिक्विडेटर लगाकर सोते हैं वे 
भेजने को गलियों में मेरे 
क्योंकि !
संवेदनाएं न शेष हैं ,अब 
मानवता की। 

मच्छर बहुत हैं,आजकल 
गलियों में मेरे। 

पानी ही पानी रह गया 
घुलकर रसायन रक्त में 
अब कह दिया है 
छोड़ने को 
गालियाँ जो उनकी 
थीं कभी
उन मच्छरों से।

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए 'एकलव्य' ब्लॉग पर जाएं >>>



ध्रुव सिंह जी एक नये ब्लॉगर व लेखक है। वर्तमान में एकलव्य ब्लॉग का संचालन कर रहे है और कविता के माध्यम से अपनी भावनाओं को प्रस्तुत करते है। ब्लॉगर से dhruvsinghvns@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है।


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