22 April, 2018

कोरा काग़ज़ है, या हसीन ख़्वाब है ज़िन्दगी | ब्लॉग ऊंचाईयाँ


“यूँ तो कोरा काग़ज़ है ज़िन्दगी
ये भी सच है ,कि कर्मों का
हिसाब - किताब है ज़िन्दगी“

“कोरा काग़ज़ है या हसीन ख़्वाब है
ज़िन्दगी
दूर से देखा तो आफ़ताब है ज़िन्दगी
कहीं समतल कहीं गहरी खाई
तो कहीं पहाड़ सी है, ज़िन्दगी“

“पृष्ठ भूमि भी हमारे ही
द्वारा सृजित है।
कर्मों पर ध्यान दे रे बन्दे
जो आज तू करता है
वही तेरा कल बनता है“

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए 'ऊंचाईयां' ब्लॉग पर जाएं >>>



श्रीमती रितु आसूजा जी सन 2013 से ब्लॉग लिख रहीं है और तब से लेकर अब तक प्रेरक और समाजिक लेखन के जरिए ब्लॉग जगत में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। उनसे ई-मेल ritu.asooja1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। 


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