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बेचारे बाबू और अधिकारी भगवन की ऊपर वाला भेटो से…

पुरातन काल मे कृष्ण, राम, यीशु अनेक पूजनीय महापुरूष हुऐ थे जिन्हे भगवन आदि नाम से पुकारा जाता है परन्तु आज के वर्तमान युग मे आमजनमानस के लिये भगवन रूपी सरकारी बाबू या अधिकारी की महिमा और लीला भी कम नाही है। पुरातन के भगवन गरीब अमीर नही देखते थे परन्तु ये कलियुगी भगवन सिर्फ अमीर या पहुॅच वाले व्यक्तियो पर हाथ रखते है।

वर्तमान मे सरकारी बाबू या अधिकारी सच मे ही पूजनीय है। मतलब यह है कि आपको अपना सरकारी कार्यालय से सम्बन्धित कोई कार्य करवाना हो तो किसी बाबू या अधिकारी की छत्रछाया अवश्य लेनी पड़ेगी और उनकी छ़त्रछाया के लिये कुछ भेट भी चढ़ानी होगी। अगर आप इन भगवनो की अराधना मे विश्वास नही करते तो अपनी फाईल को लेकर सरकारी कार्यालय के चक्कर काटते रहियेगा और हॉ! आपको ये बात और बता दे कि आपको चक्कर काटते-2 भी ये भगवन खुश नही होते।

यदि आप एक गरीब और असहाय है तो फिर आप अपने किसी भी कार्य को करवाने के लिये सरकारी कार्यालय मत जाईयेगा वरना दो-चार गालियॉ सुननी पडे़गी और बेईज्जती करके भगा दिया जायेगा। अगर आपको गालियां सुनने की आदत है और अपनी इज्जत का ख्याल नही है तो आपको तो कोई फर्क नही पडेगा लेकिन चक्कर तो काटने ही पडेगे। यदि भगवन को आप भेट चढ़ाते है तो फिर तो समझिये आप की फाईल निश्चित समय मे बिना किसी अड़चन के निकल जायेगी। चाहे उसमे कोई दिक्कत हो या कागज कम है वो तो बाबू या अधिकारी भगवन खुद ही नैयया पार करा देते है।

भई कराये भी क्यो ना उनका भी तो फर्ज बनता है कि भेट के बदले मे भेटकर्ता को फल भी प्रदान करे। मतलब यह है कि बाबू या अधिकारी खुद मे एक हस्ती है वो चाहे किसी का काम करे वो चाहे तो किसी के काम को महिनो लटकाये रखे, भई आखिरकार वह भी दिखाऐगे कि हमरा भी असत्तिव है वरना काहे के भगवन।

भईया हम तो नास्तिक है हम तो इन भगवन पर विश्वास नाही करते है हम तो अपनी सरकार और कानून के भरोसे है। कभी तो हमरा कार्य पूर्ण होगा, नही होगा तो सरकार से सवाल जवाब कर लेगे। भई करे भी काहे ना, सरकार हमे राईट टू इन्फारमेशन का अधिकार दिये है। यही तो हम जैसे पढे लिखे गरीबो का हथियार है।

हम लिखते लिखते इस सोच मे पड़ गये कि शायद बाबू या अधिकारी भगवन को सरकार वेतन नही देती क्या जो उन्हे जनता से भेट स्वीकार करके अपना और अपने परिवार का गुजर बसर करना पड़ता है। बेचारे बाबू या अधिकारी भगवन की उपर वाला भेटो से झोली भर दे।

 

यह लेख मैने 29 नवंबर 2010 को एक तत्कालीन अधिकारी महोदय थे, उन्हे वास्तविकता दिखाने के लिए लिखा था या कह सकते है कि उन्हे समर्पित किया था। अब तो वे रिटायर हो चुके है। उस दौरान मीडिया में होने के कारण सीधे-सीधे रिश्वत नहीं मांग पा रहे थे, इसलिए घुमा रहे थे।



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