Literature - August 18, 2017

अनमोल नगीने | ब्लॉग ऊंचाईयाँ

हम सदियों से ऐसा ही जीवन जीते आये हैं, हमें आदत है, हमारा जीवन यूँ ही कट जाता है।
ये सवाल सुनने को मिला जब मैं बस्ती में गयी, जब हमारे घर काम करने वाली बाई कई दिनों तक काम पर नहीं आयी थी।
किसी दूसरे घर में काम करने वाली ने बताया कि वो बहुत बीमार है उसे बुखार आ रहा हैं और उसे पीलिया की शिकायत भी है।
जब मैं अपनी बाई की झोपड़ी में पहुँची, तो वो शरीर मे जान न होने पर भी यकायक उठ के बैठ गयी।
वह बहुत कमजोर हो चुकी थी, उसे देख मेरा हृदय द्रवित हो उठा, मैंने उसे लेट जाने को कहा उसका शरीर बुखार से तप रहा था, इतने मे कोई कुर्सी ले आया मेरे बैठने के लिये।
मैंने उससे पूछा तुम्हारे घर में और कौन-कौन है। बोली मेरे दो बच्चे हैं, एक लड़का और एक लड़की।
लड़का पन्द्रह साल का है काम पर जाता है, उसे पढ़ने का भी बहुत शौंक है अभी दसवीं का पेपर दिया है, पर क्या करेगा पढ़ कर। हम ज्यादा खर्चा तो कर नहीं सकते, लड़की भी काम पर जाती है, मैंने पूछा लड़की कितने साल की है, बोली दस साल की।
मैं स्तब्ध थी, दस साल की लड़की और काम! कहने लगी हम लोगों के यहाँ ऐसा ही होता है, घर में बैठकर क्या करेंगें बच्चे, बेकार में इधर-उधर भटकेंगे, इससे अच्छा कुछ काम करेंगें, दो पैसे कमाएंगे तो दो पैसे जोड़ पाएंगे, दो-चार साल में बच्चों की शादी भी करनी होगी।

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए ‘ऊंचाईयां’ ब्लॉग पर जाएं >>>

 


श्रीमती रितु आसूजा जी सन 2013 से ब्लॉग लिख रहीं है और तब से लेकर अब तक प्रेरक और समाजिक लेखन के जरिए ब्लॉग जगत में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। उनसे ई-मेल ritu.asooja1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। रितु जी काे फेसबुक पर फालों करने के लिए यहां क्लिक करें।

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