Literature - 3 weeks ago

नया दौर, नयी सोच | ब्लॉग ऊंचाईयाँ

“आज फिर से ये सवारी किधर चली बन-ठन के….

ओहो! अम्मा जी किसी को टोकते नहीं जब वो किसी जरूरी काम से जा रहा हो।

अम्मा जी, व्यंग करते हुए बोली, जरूरी काम-

अब तुम्हे क्या जरूरी काम है, तुम्हारे सारे काम तो तुम्हारे बच्चे कर देते हैं, ऑनलाइन घर पर बैठे-बैठे, तुम्हे क्या काम है, मै जानती हूं।

क्या काम है, जरा बताओ आप तो अन्तर्यामी हो अम्मा, मुझे पता है, आपको मेरा अच्छे से तैयार होने पर शंका होती है। अम्मा बोली, नहीं बेटा शंका क्यों होगी, तेरी बेटी की शादी हो गई और चार-पांच साल में बेटे की भी हो जाएगी, तेरी बहू आएगी। बेटा बोला- मैं समझ गया कि आप क्या कहना चाहती हो कि मेरी उम्र हो गई है, मैं बूढ़ा हो गया हूं, नहीं अम्मा मैं बूढ़ा नहीं हुआ हूं और ना होउंगा। अभी मेरी उम्र ही क्या हुई है…. हंसते हुए बोला।

अम्मा बोली जा जो तेरी मर्जी वो कर मेरा क्या!

जब बहू-बेटा हंसेंगे ना तब अक्ल आयेगी….

बेटा अम्मा के पास आकर बैठ गया और बोला अम्मा, लोग क्या कहेंगे, लोग तो कुछ होने पर भी कहेंगे और कुछ ना होने पर भी कहेंगे। अम्मा नवीनता आवश्यक है, नवीनता हमारे जीवन में नया उत्साह लाती है और हमें जीवन में आगे बढने को प्रेरित करती है।

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए ‘ऊंचाईयां’ ब्लॉग पर जाएं >>>


श्रीमती रितु आसूजा जी सन 2013 से ब्लॉग लिख रहीं है और तब से लेकर अब तक प्रेरक और समाजिक लेखन के जरिए ब्लॉग जगत में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। उनसे ई-मेल ritu.asooja1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।
SourceBLOG | UNCHAIYAN


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