Poem - August 12, 2017

अनमोल खजाना | ब्लॉग ऊंचाईयां

दौड़ रहा था, मैं दौड़ रहा था

बहुत तेज रफ़्तार थी मेरी,
आगे सबसे सबसे आगे बहुत आगे
बढ़ने की चाह मे मेरे क़दम थमने का
नाम ही नहीं ले रहे थे।
यूँ तो बहुत आगे निकल आया था “मैं”
आधुनिकता के सारे साधन थे पास मेरे
दुनियाँ की चकाचौंध में मस्त, व्यस्त।
आधुनिकता के सभी साधनों से परिपूर्ण
मैं प्रस्सन था ,पर सन्तुष्ट नहीं
जाने मुझे कौन सी कमी अखरती थी।

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए ‘ऊंचाईयां’ ब्लॉग पर जाएं >>>

 


श्रीमती रितु आसूजा जी सन 2013 से ब्लॉग लिख रहीं है और तब से लेकर अब तक प्रेरक और समाजिक लेखन के जरिए ब्लॉग जगत में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। उनसे ई-मेल ritu.asooja1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। रितु जी काे फेसबुक पर फालों करने के लिए यहां क्लिक करें।

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