Poem - February 20, 2018

अब नहीं चुभते तेरे शब्दों के तीर | ब्लॉग मन से

अब नहीं चुभते तेरे शब्दों के तीर…

जो दिल को चीरकर लहूलुहान कर दे
धज्जियाँ उड़ा दे इज्जत की
स्वाभिमान बेजान कर दे
दफ़न होती सिसकियों का
जीना हराम कर दे
अब नहीं चुभते तेरे शब्दों के तीर….
जो वजूद मिटाते थे
मुझे मुझसे ही छीनकर
मेरी नजरों में गिराते थे
घूरते थे मुझको
मेरी औकात दिखाते थे
मेरी लाचारी मेरी बेबसी का
तमाशा बनाते थे
अब नहीं चुभते तेरे शब्दों के तीर…
जो गिनते थे मेरी रोटी के टुकड़े
मेरे कपड़ों के एहसान और

खिदमत में गुजारी ज़िंदगी के बदले में

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए ‘मन से’ ब्लॉग पर जाएं >>>

 


नीतू ठाकुर जी ने अक्टूबर 2017 में ब्लॉग लेखन शुरू किया है। अब तक आप अन्य समूह ब्लॉगों, चर्चा मंचों एवं वेब पत्रिकाओं में निरंतर सक्रिय रहती है।

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