Poem - December 24, 2016

‘अभिव्यक्ति’ ब्लॉग पर शुभा मेहता की दो रचनाएं

एकाकी

सुना था
कान होते हैं
दीवारों के भी
पर अब जाना
कि कान हीनहीं
दीवारें तो
होती हैं सशरीर
जब से सीखाहै
मैनें जीना
बंद दरवाजों
के भीतर
तब महसूस किया
कि ये तो
बतियाती हैं
घंटों मुझसे

 


समय

जीवन चलने कानाम
बहता है झरनेकी मानिंद
अविरत
समय के तोमानों
लगे हो पंख
उडता है
नही करता
किसी का इंतजार
बस समाप्ति की

ओर है येवर्ष ,फिर

 


शुभा मेहता सितम्बर 2013 से ब्लॉगिंग कर रही है और बचपन से ही पढ़ने की शौकीन है। उनके प्रोफाइल के अनुसार शुभा जी कहती है कि मैं अपने जीवन की छोटी छोटी अनुभूतियों को कविताओं और लेखों में पिरोने की कोशिश करती हूँ।

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