Poem - March 13, 2018

इम्तिहान – ‘जिन्दगी का’ | ब्लॉग नई सोच

उम्मीदें जब टूट कर बिखर जाती है,

अरमान दम तोड़ते यूँ ही अंधेरों में ।
कंटीली राहों पर आगे बढ़े तो कैसे ?
शून्य पर सारी आशाएं सिमट जाती हैं ।
विश्वास भी स्वयं से खो जाता है,
निराशा के अंधेरे में मन भटकता है।
जायें तो कहाँ  लगे हर छोर बेगाना सा ,
जिन्दगी भी तब स्वयं से रूठ जाती है।
तरसती निगाहें  सहारे की तलाश में ,

आकर सम्भाले कोई ऐसा अजीज चाहते हैं ।

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए ब्लॉग ‘नई सोच’ पर जाएं >>>

 


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