Poem - March 16, 2018

उम्मीद | ब्लॉग अभिव्यक्ति

न जाने किस उम्मीद मेंं

पथराई आँखें
रोज टकटकी लगा
देखा करती बंद दरवाजे को
निरन्तर..
इक आस है
अभी भी
दिल के किसी कोने में
एक दिन जरूर लौटेगा
लाल उसका
सात समुंदर पार से..

 


शुभा मेहता सितम्बर 2013 से ब्लॉगिंग कर रही है और बचपन से ही पढ़ने की शौकीन है। उनके प्रोफाइल के अनुसार शुभा जी कहती है कि मैं अपने जीवन की छोटी छोटी अनुभूतियों को कविताओं और लेखों में पिरोने की कोशिश करती हूँ।

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