Poem - July 17, 2018

एक आवाज़ | ब्लॉग ऊंचाईयाँ

“जब से मैंने अन्तरात्मा की आवाज सुनी
उसके बाद ज़माने में किसी की नहीं सुनी”

“सभ्य, सुसंस्कृत -संस्कारों”से रहित
ज़िन्दगी कुछ भी नहीं -“सभ्य संस्कारों”
के बीज जब पड़ते हैं, तभी जीवन में नये-नये
इतिहास रचे जाते हैं ।

“आगे बहुत आगे निकल आया हूँ “मैं”
ज़िन्दगी के सफ़र में चलते-चलते “

“डरा-सहमा , घबराराया ,
थका -हारा , निराश
सब कोशिशें, बेकार
मैं असाहाय , बस अब
और नहीं , अंत अब निश्चित था
जीवन के कई पल ऐसे गुज़रें “

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए ‘ऊंचाईयां’ ब्लॉग पर जाएं >>>

 


श्रीमती रितु आसूजा जी सन 2013 से ब्लॉग लिख रहीं है और तब से लेकर अब तक प्रेरक और समाजिक लेखन के जरिए ब्लॉग जगत में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। उनसे ई-मेल ritu.asooja1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।


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