Poem - November 3, 2017

कहती है मुझसे मधुशाला | ब्लॉग मन से

कहती है मुझसे मधुशाला मुझसे इतना प्यार ना कर

मै हूँ बदनामी का प्याला तू मेरा स्वीकार ना कर
इज्जत, शोहरत,सुख और शांति किस्तों में लुट जाती है
मिट जाती है भाग्य की रेखा जब मुझसे टकराती है
पावन गंगा जल भी मुझमे मिलकर विष बन जाता है
जो भी पीता है ये प्याला नशा उसे पी जाता है
 कहती है मुझसे मधुशाला मुझसे इतना प्यार ना कर
मै हूँ बदनामी का प्याला तू मेरा स्वीकार ना कर
मेरी सोहबत में ना जाने कितने घर बर्बाद हुए
छोड़ गए जो तनहा मुझको वो सारे आबाद हुए
ऐसा दोष हूँ जीवन का जीवन को दोष बनाती हूँ
प्रीत लगाता है जो मुझसे उसका चैन चुराती हूँ
कहती है मुझसे मधुशाला मुझसे इतना प्यार ना कर
मै हूँ बदनामी का प्याला तू मेरा स्वीकार ना कर

 

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए ‘मन से’ ब्लॉग पर जाएं >>>

 


नीतू ठाकुर जी ने अक्टूबर 2017 में ब्लॉग लेखन शुरू किया है। अब तक आप अन्य समूह ब्लॉगों, चर्चा मंचों एवं वेब पत्रिकाओं में निरंतर सक्रिय रहती है।

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