Poem - April 30, 2017

कीर्ति स्तम्भ | ब्लॉग एकलव्य

हिमालय के मैं गोद में

था सुषुप्त सा,रौद्र में
हिम पिघलती जा रही
पीड़ा बन, आवेग में
कोई पूछे! क्यूँ पड़ा है?
मृत हुआ सा, सोच में
देख! किरणें फूटतीं हैं
घाटियों के मध्य में
उठ! खड़ा,तनकर यहाँ
उपदेश सा तूँ, रूप में
कर प्रस्फुटित! विचार तूँ
निर्जरा संसार में,
देख! वो जो आ रहा
वायु सा, यूँ वेग से
विस्तार दे! हथेलियों को
लांग जा! अम्बर तले

 

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ध्रुव सिंह जी एक नये ब्लॉगर व लेखक है। वर्तमान में एकलव्य ब्लॉग का संचालन कर रहे है और कविता के माध्यम से अपनी भावनाओं को प्रस्तुत करते है। ब्लॉगर से dhruvsinghvns@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है।

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