Poem - February 13, 2018

चिरयौवन प्रेम | ब्लॉग मन के पाखी

तुम्हारे गुस्से भरे

बनते-बिगड़ते चेहरे की ओर
देख पाने का साहस नहीं कर पाती हूँ
भोर के शांत,निखरी सूरज सी तुम्हारी आँखों में
बैशाख की दुपहरी का ताव
देख पाना मेरे बस का नहीं न
हमेशा की तरह चुपचाप
सिर झुकाये,
गीली पलकों का बोझ लिये
मैं सहमकर तुम्हारे सामने से हट जाती हूँ
और तुम, ज़ोर से
दरवाज़ा पटक कर चले जाते हो
कमरे में फैली शब्दों की नुकीली किर्चियों को
बिखरा छोड़कर
‎बैठ जाती हूँ खोलकर कमरे की खिड़की
हवा के साथ बहा देना चाहती हूँ
कमरे की बोझिलता
नाखून से अपने हरे कुरते में किनारों में कढ़े
लाल गुलाब से निकले धागों को तोड़ती
तुम्हारी आवाज़ के

आरोह-अवरोह को महसूस करती हूँ

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए ‘मन के पाखी’ ब्लॉग पर जाएं >>>

 


श्रीमती श्वेता सिन्हा जी ने सन 2017 से ही ब्लॉग लिखना शुरू किया है और तब से लेकर अब तक 150 से ऊपर रचनाएं लिख चुकीं है। उन्होने इतने कम समय में भी ब्लॉग दुनिया में अपनी व अपने ब्लॉग की बेहतर पहचसन बना ली है। वैसे इस पहचान के लिए उनके लेखन को ही इसका श्रेय दिया जा सकता है। उनसे ई-मेल swetajsr2014@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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