Poem - March 16, 2018

तुम्हारी वाहवाही के लिए लिखता नही हूँ | ब्लॉग मेरी आवाज

तुम्हारी वाहवाही के लिए लिखता नही हूँ

मैं लिखता हूँ कि मैं ज़िन्दा हूँ ये तुम जान पाओ
हमारे कर्म कुछ ऐसे रहें कि जब भी खोजो
कभी मन्दिर, कभी मस्जिद कभी श्मशान पाओ
जमीं पर अब नही दिखती रज़ामन्दी दिलों में
जमीं से टूटकर तारों! खुला आसमान पाओ

 

 


नीलेन्द्र शुक्ल ‘नील’ जून 2016 से ब्लॉग दुनिया में आए है। ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से संस्कृत में स्नातक के छात्र है। आपसे sahityascholar1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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