Poem - November 10, 2018

दास्ता-ए-नेगी

बदल जायेगा ये जमाना, राहे नेकी पर चलने से तेरे
गलतफहमी है तेरी, खुद को समझ और बदल।
गर है तू गरीब तो
अधिकार नही जीने का, कुछ करने का तुझे।

गर है तू ईमानदार तो
अधिकार नही रहने का तुझे समाज मे।
गर है तू खिलाफ रिश्वत के तो
काबिल नही तू नजरो मे नौकरशाहो की।

गर है तू देश के कानून के भरोसे तो
तेरा जो है वो भी छीन लेगा जालिम जमाना सारा।
गर छोड़ दे ईमाने धर्म तो
दुनिया होगी मुटठी मे तेरी
और होगा नाम तेरा शरीफो की गिनती में।

गर ढाल ले तू खुद को साथ समय के तो
तेरे साथ होगा जमाना सारा
और सफलता होगी कदमो मे तेरी।

गहरी नींद सो रहा, मीठे सपनो मे खोया
जमाने की कूटनीति से बेखबर, तभी तो है नाकाबिल ‘नेगी’
नौकरशाहो और समाज की नजरो में।

अब तो उठ जा ‘नेगी’ वरना सब कुछ छीन लेगा
ये जालिम जमाना तेरा।

 

ये कविता मेरी खुद की लिखी पहली और अंतिम कविता है (उस दौरान मुझे ‘नेगी’ के नाम से जानते थे, जिसकी कहानी बहुत लंबी है)। इस कविता को मैने 26 जनवरी 2011 में लिखा था जो एक सरकारी अधिकारी को समर्पित है, जिसके विषय में आपको पहले बता चुका हूं। इस कविता के बाद मैने कभी कवि बनने की कोशिश नहीं की और मुझे रूचि रही। क्योंकि मैने इस कविता और पहले वाले लेख से उन्हे सबक सीखा चुका था।



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