Poem - February 7, 2018

नदी | ब्लॉग अभिव्यक्ति

मैं हूँ नदी…

निकल कर पहाड़ों की गोद से,
आ पहुँचती धरा पर
सबका जीवन
निर्मल करने
रवि किरणें जब
मुझको छूती
मैं चमक उठती रजत सी
इठलाती, बलखाती
चंचल, चपल
जीवन देनारी।
पर हे मानव…
तू क्यों है

इतना स्वार्थ मगन

 


शुभा मेहता सितम्बर 2013 से ब्लॉगिंग कर रही है और बचपन से ही पढ़ने की शौकीन है। उनके प्रोफाइल के अनुसार शुभा जी कहती है कि मैं अपने जीवन की छोटी छोटी अनुभूतियों को कविताओं और लेखों में पिरोने की कोशिश करती हूँ।

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