Poem - April 23, 2018

मैं नारी खोज रही | ब्लॉग गुफ्तगू

मैं नारी

खोज रही अस्तित्व को
हर उम्र , हर पड़ाव को लांघते
बाहर के अंधेरे से बचते
तो गुम होती
भीतर के स्याह घेरे में
ये कौन सा आसेब ?
जो टिका है, नाभि के नीचे
जो जकड़ लेता है मेरे वजूद को
सहमता हर रोज सन्नाटा में
बना क्यूँ है कमजोर सृजन अंग

आबरू की डोर, ममत्व के संग

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए ‘गुफ़्तगू’ ब्लॉग पर जाएं >>>

 


पम्मी सिंह जी 2015 से ब्लॉग लेखन कर रहीं है। इसके अलावा आप अन्य समूह ब्लॉगों, चर्चा मंचों एवं वेब पत्रिकाओं में निरंतर सक्रिय रहती है और अापका एक कविता संग्रह भी प्रकाशित हो चुका है।

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