Poem - October 1, 2017

मै खड़ा हूँ | ब्लॉग बोल सखी रे

चाहता हूँ तुम्हे लिपिबद्ध कर लूं

न जाने कब छिटक कर दूर हो जाओ
किसी भूले-भटके विचार की मानिन्द,
मै खोजता ही रहूँ तुम्हे
चेतना की असीमित परतों में….
तुम्हारी लंबित मुलाकातों में
तुमसे ज्यादा;
तुम्हारी अल्लहड़ हंसी होती है,
वो बेसाख्ता मुस्कुराती हुयी पलकें
जैसे थाम लेती हैं मन की उड़ान.
तुम्हारी उँगलियों में कसमसाती है धूप;
और तुम बाहें फैलाए उड़ा देती हो उसे

इन्द्रधनुषीय रंगों में,

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए ‘ब्लॉग बोल सखी रे’ ब्लॉग पर जाएं >>>

 


अपर्णा बजपेयी जी जम्शेद्पुर में रहती है। आपने 2016 में ही ब्लॉग लेखन शुरू किया है और वर्तमान में झारखंड में आदिवासियों के बीच स्वास्थ, शिक्षा, आजीविका के मुद्दे पर काम कर रहीं है। दैनिक हिन्दुस्तान, जन संदेश टाइम्स, कथाक्रम तथा अन्य कई पत्र पत्रिकाओं में आपकी कविता और कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं।

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