Poem - April 17, 2018

मोहब्बत खुदा है | ब्लॉग ऊंचाईयाँ

“मोहब्बतों की डोर से बँधे हैं

हम सब
मोहब्बत ना होती तो हम बिखर
 जाते तितर-बितर हो जाते “
“चाहतों की भी एक फ़ितरत है
चाहता भी उसे है ,जो नसीब में
नहीं होता”
कहते हैं की मोहब्बत में इंसान खुदा हो जाता है
    खुदा हो जाता है शायद इसीलिए सबसे
जुदा हो जाता है ।
“ना जाने क्यों लोग मोहब्बत को बदनाम
किया करते हैं ,मोहब्बत तो दिलों में पनपा करती है
मोहब्बत के नाम पर क्यों ?
क़त्ल ए आम किया करते हैं “
“मोहब्बत तो रूह से रूह का मिलन है

मिट्टी का तन सहता सितम है “

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए ‘ऊंचाईयां’ ब्लॉग पर जाएं >>>

 


श्रीमती रितु आसूजा जी सन 2013 से ब्लॉग लिख रहीं है और तब से लेकर अब तक प्रेरक और समाजिक लेखन के जरिए ब्लॉग जगत में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। उनसे ई-मेल ritu.asooja1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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