Poem - July 1, 2017

लौट आये फिर कहीं प्यार… | ब्लॉग नई सोच

सांझ होने को है……

रात आगे खडी,
बस भी करो अब शिकवे,
बात बाकी पडी…
सुनो तो जरा मन की,
वह भी उदास है।
ऐसा भी क्या है तड़पना
अपना जब पास है।
ना कर सको प्रेम तो,
चाहे झगड़ फिर लो…
नफरत की दीवार लाँघो,
चाहे उलझ फिर लो…
शायद सुलझ  भी जाएंं
खामोशियों के ये तार…
लौट आयेंं बचपन की यादें,
लौट आये फिर कहीं प्यार…?
खाई भी गहरी सी है,
तुम पाट डालो उसे…
सांझ ढलने से पहले,
बाग बना लो उसे…
नन्हींं नयी पौध से फिर,
महक जायेगा घर-बार …
लौट आयें बचपन की यादें…
लौट आये फिर कहीं प्यार…?

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें >>>

 


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