Poem - March 20, 2017

विवाह (एक दृश्य) | मेरी आवाज़

आस्था का देव से अब हो रहा संगम यहाँ ।

सात फेरों से सजा है प्यार का बंधन यहाँ ।।
माह बाकी है अभी से हो रही तैयारियाँ,
सज रहें हैं घर सुहावन सज रही हैं क्यारियाँ
मित्र ,बन्धु संग साथी फोनकर – कर कह रहे
छोड़ दूँगा इस महोत्सव में भरी पिचकारियाँ
फिर तुम्हें उन सात रंगों में रगूँगा इस कदर
भूल जाओगी सभी दुःख,और आओगी निखर
प्रेम की बातें मगर यह दे रही उलझन यहाँ ।।
बीतती है रात जग – जग ,बीतते हैं दिन सभी
अब नही कहता कोई कुछ काम कर लो तुम कभी
मिल रहा है स्नेह सबसे ,मिल रहा है प्यार भी
हो रहा है आजकल मेरा बहुत सत्कार भी
मैं अचम्भित हो रही हूँ बदलते व्यवहार से
ये बहन भी दूर होती जा रही इस यार से

देवतासम मानते सब कर रहे वन्दन यहाँ ।।

 

 


नीलेन्द्र शुक्ल ‘नील’ जून 2016 से ही ब्लॉग दुनिया में आए है। ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से संस्कृत में स्नातक के छात्र है। आपसे sahityascholar1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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