Poem - October 14, 2018

वृद्ध होती माँ…. | ब्लॉग नई सोच

सलवटें चेहरे पे बढती, मन मेरा सिकुड़ा रही है
वृद्ध होती माँ अब मन से बचपने में जा रही हैं।

देर रातों जागकर जो घर-बार सब सँवार ती थी,
*बीणा*आते जाग जाती, नींद को दुत्कारती थी।
शिथिल तन बिसरा सा मन है, नींद उनको भा रही है,
वृद्ध होती माँ अब मन से बचपने में जा रही हैंं।

हौसला रखकर जिन्होंने हर मुसीबत पार कर ली,
अपने ही दम पर हमेशा, हम सब की नैया पार कर दी।

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए ब्लॉग ‘नई सोच’ पर जाएं >>>


सुधा देवरानी जी 2016 से ब्लॉगिग कर रहें है और अपनी कविताओं को नई सोच ब्लॉग के माध्यम से पाठको के बीच रख रहीं है। ब्लॉगर सुधा जी से ई-मेल sdevrani16@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है।
SourceBLOG NAI SOCH


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