Poem - June 12, 2017

संघर्ष -यानि संग-हर्ष जियो | ऊंचाईयां

जीवन है तो संघर्ष है

यूं तो प्रकृति प्रदत्त सब और सम्पदा है
जीवन को तो जीना है, क्यों ना फिर
संग-हर्ष जियो।
समय का पहिया घूम रहा है
युग परिवर्तन हो रहा है।
परिवर्तन प्रकृति का नियम है।
अविष्कार भी आवश्यकता का कारण है
मानव बुद्धि में उपजे अणुओं,
मानव की दिव्य आलौकिक बुद्धि
ने दुनियाँ को नये-नये आयाम दिये हैं
आकाश क्या अन्तरिक्ष में भी मानव के

कदम पढ़े है ।

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए ‘ऊंचाईयां’ ब्लॉग पर जाएं >>>

 


श्रीमती रितु आसूजा जी सन 2013 से ब्लॉग लिख रहीं है और तब से लेकर अब तक प्रेरक और समाजिक लेखन के जरिए ब्लॉग जगत में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। उनसे ई-मेल ritu.asooja1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। रितु जी काे फेसबुक पर फालों करने के लिए यहां क्लिक करें।

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