Poem - October 30, 2018

उनकी दुनिया के बाहर | संजोयी हुई रचनाएं – 1

कुछ रचनाएं ऐसी होती है जो यादगार रहती है तो कुछ ऐसी होती है जो मन-मष्तिष्क को विचलित कर देती है या सोचने को मजूबर कर देती है। ऐसी ही एक रचना जिसे मैने 2005 में एक वर्कशॉप के दौरान हरियाणा में सुना था। तब मुझे यह रचना बहुत ही मार्मिक लगी और मैने इसे अपनी पर्सनल डायरी में लिख डाला। इस प्रकार मै इसका मूल लेखक नहीं हूँ, बस प्रस्तुतकर्ता हूँ।

चित्रकारो, राजनितिज्ञो, दार्शनिको की
दुनिया के बाहर
मालिको की दुनिया के बाहर
पिताओ की दुनिया के बाहर
और बहुत से काम करती है।

वे बच्चे को बैल जैसा बलिष्ठ
नौजवान बना देती है।
आटे को रोटी मे
कपड़े को पोशाक में
और धागे को कपड़े मे बदल देती है।

वे खंडहरो को
घरो मे बदल देती है
और घरो को र्स्वग में।
वे काले चुल्हे की
मिटटी से चमका देती है
और तमाम चीजो संवार देती है।

वे बोलती है और
कई अंधविश्वासो को जन्म देती है व
कथाऐं व लोकगीत रचाती है।
बाहर कही की दुनिया के आदमी को
देखते ही खामोश हो जाती है।



2 Comments

  1. बेहद सराहनीय रचना का बहुमूल्य संकलन है आदरणीय।साहित्य के उज्जवल भविष्य के लिए किया गया आपका सतत प्रयास बेहद सराहनीय है। हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएँ स्वीकार करें मेरी।

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